Wednesday, 9 July 2008

जब कुत्ते की मौत आती है तो वो मस्जिद पर जाकर पेशाब करता है

बात सन १९६५ की है अमेरिका विअतनाम से युद्ध में बुरी तरह उलझा हुआ था सैकड़ों की संख्या में अमरीकी लडके मारे जा रहे थे, लेकिन अमेरिका का अहम् कम होने का नाम ही नही ले रहा था आखिर एक पिद्दी से देश ने उसे धूल जो छठा दी थी खैर अमे० का मिथ्याभिमान १९७२ के आते-आते चकनाचूर हो गया और उसे विअतनाम की धरती से उल्टे पांवभागना पड़ा
एक पुरानी हिन्दुस्तानी कहावत है - जब कुत्ते की मौत आती है तो वो दौड़ता हुआ जाता है और मस्जिद पर टांग उठा कर पेशाब कर देता है मुल्ला डंडा उठाकर उसके सर पर दे मारता है और फिर ............... लेकिन लगता है विअतनाम का डंडा कुछ हल्का पड़ा था इसीलिए जल्द ही कुत्ता अपने रंग में आ गया वैसे भी कुत्ते की पूंछ टेढ़ी की टेढ़ी ही रहती है इस बार उसने मुह उठाया तो सामने मध्य एशिया का सबसे बड़ा तेल बाजार था कुवैत को हथियार बनाकर उसने ईराक के तेल भंडारों को हड़पने की भरसक कोशिश की ईराक ने जोर्डन तक पाइप लाइन बिछाने के अमरीका के प्रस्ताव को मानने से इंकार जो कर दिया था खैर २७ देशों की सेना के साथ भी सीनियर बुश ईराक का किला नही बेध सके ईराक पर अनगिनत प्रतिबन्ध लाद दिए गए जिससे वो अमेरिका की दासता ख़ुद स्वीकार कर ले लेकिन 'सद्दाम रीति सदा चली आई रस्सी जल जाई पर अकड़ न जाई' की तर्ज पर सद्दाम ने झुकने से इनकार कर दिया इसी बीच ११ सितम्बर की घटना घाट गई ओसामा को छु भी न सकने वाली अमेरिकी और मित्र देशों की सेना ने खीझ में अफगानिस्तान को नेस्तनाबूत कर डाला हालाकि इससे अफगानिस्तान को कुछ समय के लिए कट्टरपंथियों से छुटकारा मिल गया लेकिन अमेरिका का मकसद कुछ और ही था
शायद इसीलिए एक बार कुत्ते को मस्जिद दिखाई दे रही थी सामने ईराक का तेल भंडार नजर आ रहा था और पुराने पड़े लट्ठ का बदला भी लेना था सो विनाशक हथियारों का जखीरा होने और ९-११ के हमलावरों की शरंस्थाली होने का आरोप मध् ईराक पर हमला बोल दिया गया विश्व सभ्यताओं के पालने को रौंद डाला गया दजला-फरात का पानी लाल हो उठा न विनाशकारी हथियार मिले न उन हथियारों को चलाने वाले , लेकिन सद्दाम के दोनों बेटों को भून डाला गया सद्दाम को ऐसे पकड़ते दिखाया गया जैसे किसी काले साँप को बिल में से पकड़ा जाता है और फिर उसकी मौत की नुमाइश कर अपनी दादागिरी का ऐलान उसी तरह कर दिया गया जैसे रात के १२ बजे किसी चौराहे पर अलग-अलग दिशाओं से कुत्तो की टोली आ जाती है वो आपस में लड़ते-भिड़ते हैं, भौका-भौकी होती है और फिर एक ग्रुप को छोड़ बाकि भाग जाते हैं बचे हुए कुत्ते फर्जी तरीके से और जोर-जोर से भौकने लगते हैं, शायद अपनी जीत का एलान कर रहे होते हैं ,लेकिन वो नही जानते की उनकी इस भौक का असर उल्टा होने वाला है भाग गए कुत्ते एक जुट हो जाते हैं और फिर गुरिल्ला वार शुरू हो जाता है ऐसा ही कुछ ईराक में देखने को मिला एक लाख से भी ज्यादा बेक़सूर इराकियों को मौत के घाट उतार दिया गया केवल तेल के कुओं पर कब्जे की खातिर और फिर सद्दाम को फांसी दे कर इसे तार्किक बनने का यत्न किया गया
जूनियर बुश ने एलान किया ईराक को वितनाम नही बनने दिया जाएगा शायद सर पर पड़ी लाठी याद थी लेकिन बुश साहब को लाठी तो याद रही , उससे मिला सबक वो भूल गए क्योंकि कुत्ते ने मस्जिद पे फिर मूत दिया था वियतनाम की तरह ईराक में भी अमेरिका को मुह की खानी पड़ रही है हजारों की तादाद में अमेरिका और मित्र देशों के सैनिक -नागरिक मारे जा चुके हैं और मारे जा रहे हैं सद्दाम को हथियार बना कर और आजादी का चुग्गा दाल कर जिन शिया-शुन्नियों को लड़ाया जा रहा था वो अब एक हो चुके हैं और उसी अमेरिका से लोहा ले रहे हैं जिसने उन्हें लड़वाया था वियतनाम की तरह यहाँ भी अमेरिका की हालत खस्ता हो चुकी है रोज उसके सैनिक गोरिल्ला लडाई में मारे जा रहे हैं और उसे लाखों डालर का नुक्सान हो रहा है पूरी दुनिया भी जान चुकी है की असल खेल तो तेल का है, आतंकवाद केवल मुखौटा है अमेरिका की तुलना हिन्दुस्तान की सब्जी मंडियों में घूमते उस सांड से करना बेहतर होगा जो मस्ती से घूमता रहता है और जहाँ उसे मनपसंद टोकरी मिल जाती है वो अपना मुह गदा देता है कुंजड़ा उसके माथे पर डंडा बरसता रहता है लेकिन वो तभी हटता है जब काफी कुछ मुह में भर चुका होता है
अभी शायद सांड का पेट भरा नही या कहे की तीन बार सर पर पड़ी लाठियों से बच जाने की वजह से कुत्ता ढीठ हो गया है इसीलिए उसे एक बार फिर लग गई है और वो मुह उठाये दुनिया की सबसे बड़ी मस्जिद (ईरान) की तरफ़ दौड़ने लगा है वैसे विधाता की डिक्शनरी में भी तीन ही बार माफ़ करने का विधान है सो अब देखने वाली बात होगी की इस मस्जिद के मुल्ला की लाठी में इतना दम है या नही की वो कुत्ते का राम-नाम-सत करवा सके

3 comments:

RITESH KUMAR SRIVASTAVA said...

वाह दादा वाह क्या बात है... अब आप भी ब्लाग की दुनिया के बेताज बादशाह बनने की ओर अग्रसर हैं। बस दिल खोल कर लिखिए कुछ दिन बाद आपको लाखों रूपए के विज्ञापन का जखीरा मिल जाएगा. उसके बाद शुरू हो जाएगा 'तै मोका नई जनते'... तो ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ आपके कुत्ते को सलाम जो मस्जिद पर जाकर मूतने की हिमाकत कर रहा है...जय श्री राम...

ravi maurya said...

Dada ki style, vo bhi kutte vali. viswas nahi hota. vaise badiaya likho ho. Tevar dekh k to yahi lagta hai ki nexttime sabko 'LATIYA' daloge.
blog k liye bahut-bahut shubhkanayein

Sandeep Singh said...

बुश टांग उठाएं न उठाएं उनकी सरकार पैर उठा चुकी है। कार्यकाल पूरा होने के दिन करीब हैं, और साख बचाने के लिए बस भारत से एटमिक करार पर हस्ताक्षर की आस बची है। ऐसे में बुश के लिए क्या ईरान और क्या तेहरान। वो तो तेल की धार के फेर में अपनी धार इतनी कमजोर कर चुके हैं कि कपड़े गीले होने पर ही उन्हें पता चलता है कि...कुछ हुआ।
एक बात और 'डुगडुगी' में विविधता भरे लेख तो बहुत सारे खप सकते हैं लेकिन यकीनन
"लालबत्ती" ज्यादा संभावनाशील है।