इसी हफ्ते इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एक ठीक-ठाक पत्रकार साहब का लेख एक ठीक-ठाक पेपर में छपा! लेख में पत्रकार साहब ने आस्था के ठेकेदारों की जम कर ख़बर ली इले० मीडिया के लगभग सभी प्रतिष्ठित समाचार चैनलों की पोल उन्होंने खोल डाली उनकी लेखनी का कमाल काफी अच्छा लगा लगा की अभी पत्रकारिता की आत्मा मरी नही है , लेकिन ये क्या पत्रकार साहब ने ही सारा बेडा गर्ग कर दिया आप सोच रहे होंगे कैसे अरे भाई मेरे एक विश्वस्त सूत्र ने पत्रकार साहब की ही पोल खोल दी पता लगा की माननीय पत्रकार साहब ख़ुद ही आस्था के बहुत बड़े ठेकेदार रह चुके हैं और वर्त्तमान में भी उनके हिस्से आस्था, भक्ति और विश्वास के बड़े टेंडर हैं सो कभी साईं तो कभी राम, कभी ईसा तो कभी श्याम, सब को अपने चैनल पर पब्लिक के सामने सजाकर परोसने का काम इन्ही पत्रकार महोदय का है
खैर छोडिये कथनी और करनी में अन्तर तो आज की मीडिया (एक को छोडकर ) का पेसमेकर बन चुका है पेसमेकर हटाया नही की हार्ट अटैक हुआ समझो सो अगर मीडिया को जिन्दा रहना है तो ये सब तो चलता ही रहेगा लेकिन अभी किस्सा खत्म नही हुआ , बात हो रही है आस्था की ठेकेदारी की
दरअसल इसे ठीक से समझाने के लिए मुझे " लव स्टोरी -२०५० " वाली टाइम मशीन में बैठ कर थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा , शायद ८-१० साल पीछे मैं ग्रैजुअशन कर रहा था की अचानक टीवी चैनलों पर भगवान गदेश प्रकट हुए , ऐसे-वैसे नही दूध पीने वाले भगवन गदेश समाचार चैनलों या कहे मीडिया (पत्र-पत्रिकाए भी) की आस्था ने यही किलकारी मारी थी कुछ महीने बाद अचानक हनुमान जी भी दूध पीने लगे लोग मंदिरों में, घरों में भगवान को दूध पिलाने लगे ये उनकी अंध-भक्ति , श्रद्धा , विश्वास एवं सच्ची आस्था थी लेकिन चैनलों और समाचार चैनलों की तो पौ-बारह हो गई हर नुक्कड़-चौराहे पर रिपोर्टर तैनात हो गए और पल-पल की खबर प्रसारित की गई , यहाँ तक की लोगों को सोते हुए से उठाकर जबरन भगवान को दूध पिलवाते हुए शूट किया गया चैनालीय आस्था के लिए इन सब ने कॉम्प्लान और चवनप्राश जैसा काम किया
अब सोचता हूँ की जैसे हमारे यहाँ कभी बुंदेलखंड में , कभी विदर्भ में, कभी कालाहांडी में तो कभी तेलंगाना में अकाल पड़ा रहता है , वैसे ही कुछ अकाल उस समय स्वर्ग लोक में पड़ा रहा होगा ,तभी तो भगवान जी लोग खाने-पीने नरक लोक चले आए थे और आए भी तो इन कम्बखक्त चैनल वालों ने उन्हें चैन से खाने-पीने भी नही दिया इनके डर के मारे भगवान जी लोगों को एक दिन में जितना दूध पीना था पिया और चलते बने जरा इन मीडिया वालों से कोई पूंछे की इस दौरान देश के आंध्र प्रदेश , ओडिसा और विदर्भ में सूखे और सूदखोरी से मर रहे कितने किसानो के घर जा कर इन चैनल वालों, पेपर वालों ने रिपोर्टिंग की, उनकी दुर्दशा को उठाया ज्यादातर ऐसी खबरें ग्राफिक्स, आकडों और एंकर के सहारे ही निबटा दी जाती हैं कौन जाए शहर को छोड़ गाव-गोरु के बीच
फिलहाल आस्था के ठेकेदार जिन टेंडरों पर काम कर रहे हैं उनमे साईं बाबा की बोलती तस्वीर, श्री राम का इंटरव्यू , राम के निशान , स्वर्ग की सीढिया और रक्त-रंजित इसामसीह प्रमुख हैं इन टेंडरों की खास बात ये है की अकूत समय और धन की बर्बादी के बावजूद ये किसी कान के नही हैं
अब सीधे-सीधे देशी स्टाइल में कहा जाए तो टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग पॉइंट) उस सब्जी मंडी की तरह है जिसमे चैनल रूपी कुंजड़े अपनी दूकान सजाये बैठे हैं आस्था, अपराध , राजनीती और खेल वो सब सब्जिया हैं जिनकी बिक्री हो रही है फिलहाल मौसमी सब्जी आस्था की डिमांड कुछ ज्यादा है, सो ये सभी कुंजदों के पास काफ़ी स्टाक में है क्राइम, पॉलिटिक्स की सब्जी खाते खाते ग्राहक उब गए हैं , सो इनका स्टाक कम कुंजदों के पास ही बचा है बारहमासी सब्जी स्पोर्ट्स और फिल्मों की डिमांड भी ठीक-ठाक है
तो शाम के ६ बजे हैं मंडी सज चुकी है और कुंजड़े चिल्ला रहे हैं ----- आस्था ले लो आस्था ३० रुपये किलो, भक्ति-योग ले लो २० रुपये किलो, बहुत सस्ती सब्जी है साहब, क्राइम-पॉलिटिक्स ले लो केवल ५ रुपये किलो...........सब्जी ले लो सब्जी.