Sunday, 13 July 2008

आस्था ले लो आस्था ३० रुपये किलो

इसी हफ्ते इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एक ठीक-ठाक पत्रकार साहब का लेख एक ठीक-ठाक पेपर में छपा! लेख में पत्रकार साहब ने आस्था के ठेकेदारों की जम कर ख़बर ली इले० मीडिया के लगभग सभी प्रतिष्ठित समाचार चैनलों की पोल उन्होंने खोल डाली उनकी लेखनी का कमाल काफी अच्छा लगा लगा की अभी पत्रकारिता की आत्मा मरी नही है , लेकिन ये क्या पत्रकार साहब ने ही सारा बेडा गर्ग कर दिया आप सोच रहे होंगे कैसे अरे भाई मेरे एक विश्वस्त सूत्र ने पत्रकार साहब की ही पोल खोल दी पता लगा की माननीय पत्रकार साहब ख़ुद ही आस्था के बहुत बड़े ठेकेदार रह चुके हैं और वर्त्तमान में भी उनके हिस्से आस्था, भक्ति और विश्वास के बड़े टेंडर हैं सो कभी साईं तो कभी राम, कभी ईसा तो कभी श्याम, सब को अपने चैनल पर पब्लिक के सामने सजाकर परोसने का काम इन्ही पत्रकार महोदय का है

खैर छोडिये कथनी और करनी में अन्तर तो आज की मीडिया (एक को छोडकर ) का पेसमेकर बन चुका है पेसमेकर हटाया नही की हार्ट अटैक हुआ समझो सो अगर मीडिया को जिन्दा रहना है तो ये सब तो चलता ही रहेगा लेकिन अभी किस्सा खत्म नही हुआ , बात हो रही है आस्था की ठेकेदारी की

दरअसल इसे ठीक से समझाने के लिए मुझे " लव स्टोरी -२०५० " वाली टाइम मशीन में बैठ कर थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा , शायद ८-१० साल पीछे मैं ग्रैजुअशन कर रहा था की अचानक टीवी चैनलों पर भगवान गदेश प्रकट हुए , ऐसे-वैसे नही दूध पीने वाले भगवन गदेश समाचार चैनलों या कहे मीडिया (पत्र-पत्रिकाए भी) की आस्था ने यही किलकारी मारी थी कुछ महीने बाद अचानक हनुमान जी भी दूध पीने लगे लोग मंदिरों में, घरों में भगवान को दूध पिलाने लगे ये उनकी अंध-भक्ति , श्रद्धा , विश्वास एवं सच्ची आस्था थी लेकिन चैनलों और समाचार चैनलों की तो पौ-बारह हो गई हर नुक्कड़-चौराहे पर रिपोर्टर तैनात हो गए और पल-पल की खबर प्रसारित की गई , यहाँ तक की लोगों को सोते हुए से उठाकर जबरन भगवान को दूध पिलवाते हुए शूट किया गया चैनालीय आस्था के लिए इन सब ने कॉम्प्लान और चवनप्राश जैसा काम किया

अब सोचता हूँ की जैसे हमारे यहाँ कभी बुंदेलखंड में , कभी विदर्भ में, कभी कालाहांडी में तो कभी तेलंगाना में अकाल पड़ा रहता है , वैसे ही कुछ अकाल उस समय स्वर्ग लोक में पड़ा रहा होगा ,तभी तो भगवान जी लोग खाने-पीने नरक लोक चले आए थे और आए भी तो इन कम्बखक्त चैनल वालों ने उन्हें चैन से खाने-पीने भी नही दिया इनके डर के मारे भगवान जी लोगों को एक दिन में जितना दूध पीना था पिया और चलते बने जरा इन मीडिया वालों से कोई पूंछे की इस दौरान देश के आंध्र प्रदेश , ओडिसा और विदर्भ में सूखे और सूदखोरी से मर रहे कितने किसानो के घर जा कर इन चैनल वालों, पेपर वालों ने रिपोर्टिंग की, उनकी दुर्दशा को उठाया ज्यादातर ऐसी खबरें ग्राफिक्स, आकडों और एंकर के सहारे ही निबटा दी जाती हैं कौन जाए शहर को छोड़ गाव-गोरु के बीच

फिलहाल आस्था के ठेकेदार जिन टेंडरों पर काम कर रहे हैं उनमे साईं बाबा की बोलती तस्वीर, श्री राम का इंटरव्यू , राम के निशान , स्वर्ग की सीढिया और रक्त-रंजित इसामसीह प्रमुख हैं इन टेंडरों की खास बात ये है की अकूत समय और धन की बर्बादी के बावजूद ये किसी कान के नही हैं

अब सीधे-सीधे देशी स्टाइल में कहा जाए तो टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग पॉइंट) उस सब्जी मंडी की तरह है जिसमे चैनल रूपी कुंजड़े अपनी दूकान सजाये बैठे हैं आस्था, अपराध , राजनीती और खेल वो सब सब्जिया हैं जिनकी बिक्री हो रही है फिलहाल मौसमी सब्जी आस्था की डिमांड कुछ ज्यादा है, सो ये सभी कुंजदों के पास काफ़ी स्टाक में है क्राइम, पॉलिटिक्स की सब्जी खाते खाते ग्राहक उब गए हैं , सो इनका स्टाक कम कुंजदों के पास ही बचा है बारहमासी सब्जी स्पोर्ट्स और फिल्मों की डिमांड भी ठीक-ठाक है

तो शाम के बजे हैं मंडी सज चुकी है और कुंजड़े चिल्ला रहे हैं ----- आस्था ले लो आस्था ३० रुपये किलो, भक्ति-योग ले लो २० रुपये किलो, बहुत सस्ती सब्जी है साहब, क्राइम-पॉलिटिक्स ले लो केवल ५ रुपये किलो...........सब्जी ले लो सब्जी.

Wednesday, 9 July 2008

जब कुत्ते की मौत आती है तो वो मस्जिद पर जाकर पेशाब करता है

बात सन १९६५ की है अमेरिका विअतनाम से युद्ध में बुरी तरह उलझा हुआ था सैकड़ों की संख्या में अमरीकी लडके मारे जा रहे थे, लेकिन अमेरिका का अहम् कम होने का नाम ही नही ले रहा था आखिर एक पिद्दी से देश ने उसे धूल जो छठा दी थी खैर अमे० का मिथ्याभिमान १९७२ के आते-आते चकनाचूर हो गया और उसे विअतनाम की धरती से उल्टे पांवभागना पड़ा
एक पुरानी हिन्दुस्तानी कहावत है - जब कुत्ते की मौत आती है तो वो दौड़ता हुआ जाता है और मस्जिद पर टांग उठा कर पेशाब कर देता है मुल्ला डंडा उठाकर उसके सर पर दे मारता है और फिर ............... लेकिन लगता है विअतनाम का डंडा कुछ हल्का पड़ा था इसीलिए जल्द ही कुत्ता अपने रंग में आ गया वैसे भी कुत्ते की पूंछ टेढ़ी की टेढ़ी ही रहती है इस बार उसने मुह उठाया तो सामने मध्य एशिया का सबसे बड़ा तेल बाजार था कुवैत को हथियार बनाकर उसने ईराक के तेल भंडारों को हड़पने की भरसक कोशिश की ईराक ने जोर्डन तक पाइप लाइन बिछाने के अमरीका के प्रस्ताव को मानने से इंकार जो कर दिया था खैर २७ देशों की सेना के साथ भी सीनियर बुश ईराक का किला नही बेध सके ईराक पर अनगिनत प्रतिबन्ध लाद दिए गए जिससे वो अमेरिका की दासता ख़ुद स्वीकार कर ले लेकिन 'सद्दाम रीति सदा चली आई रस्सी जल जाई पर अकड़ न जाई' की तर्ज पर सद्दाम ने झुकने से इनकार कर दिया इसी बीच ११ सितम्बर की घटना घाट गई ओसामा को छु भी न सकने वाली अमेरिकी और मित्र देशों की सेना ने खीझ में अफगानिस्तान को नेस्तनाबूत कर डाला हालाकि इससे अफगानिस्तान को कुछ समय के लिए कट्टरपंथियों से छुटकारा मिल गया लेकिन अमेरिका का मकसद कुछ और ही था
शायद इसीलिए एक बार कुत्ते को मस्जिद दिखाई दे रही थी सामने ईराक का तेल भंडार नजर आ रहा था और पुराने पड़े लट्ठ का बदला भी लेना था सो विनाशक हथियारों का जखीरा होने और ९-११ के हमलावरों की शरंस्थाली होने का आरोप मध् ईराक पर हमला बोल दिया गया विश्व सभ्यताओं के पालने को रौंद डाला गया दजला-फरात का पानी लाल हो उठा न विनाशकारी हथियार मिले न उन हथियारों को चलाने वाले , लेकिन सद्दाम के दोनों बेटों को भून डाला गया सद्दाम को ऐसे पकड़ते दिखाया गया जैसे किसी काले साँप को बिल में से पकड़ा जाता है और फिर उसकी मौत की नुमाइश कर अपनी दादागिरी का ऐलान उसी तरह कर दिया गया जैसे रात के १२ बजे किसी चौराहे पर अलग-अलग दिशाओं से कुत्तो की टोली आ जाती है वो आपस में लड़ते-भिड़ते हैं, भौका-भौकी होती है और फिर एक ग्रुप को छोड़ बाकि भाग जाते हैं बचे हुए कुत्ते फर्जी तरीके से और जोर-जोर से भौकने लगते हैं, शायद अपनी जीत का एलान कर रहे होते हैं ,लेकिन वो नही जानते की उनकी इस भौक का असर उल्टा होने वाला है भाग गए कुत्ते एक जुट हो जाते हैं और फिर गुरिल्ला वार शुरू हो जाता है ऐसा ही कुछ ईराक में देखने को मिला एक लाख से भी ज्यादा बेक़सूर इराकियों को मौत के घाट उतार दिया गया केवल तेल के कुओं पर कब्जे की खातिर और फिर सद्दाम को फांसी दे कर इसे तार्किक बनने का यत्न किया गया
जूनियर बुश ने एलान किया ईराक को वितनाम नही बनने दिया जाएगा शायद सर पर पड़ी लाठी याद थी लेकिन बुश साहब को लाठी तो याद रही , उससे मिला सबक वो भूल गए क्योंकि कुत्ते ने मस्जिद पे फिर मूत दिया था वियतनाम की तरह ईराक में भी अमेरिका को मुह की खानी पड़ रही है हजारों की तादाद में अमेरिका और मित्र देशों के सैनिक -नागरिक मारे जा चुके हैं और मारे जा रहे हैं सद्दाम को हथियार बना कर और आजादी का चुग्गा दाल कर जिन शिया-शुन्नियों को लड़ाया जा रहा था वो अब एक हो चुके हैं और उसी अमेरिका से लोहा ले रहे हैं जिसने उन्हें लड़वाया था वियतनाम की तरह यहाँ भी अमेरिका की हालत खस्ता हो चुकी है रोज उसके सैनिक गोरिल्ला लडाई में मारे जा रहे हैं और उसे लाखों डालर का नुक्सान हो रहा है पूरी दुनिया भी जान चुकी है की असल खेल तो तेल का है, आतंकवाद केवल मुखौटा है अमेरिका की तुलना हिन्दुस्तान की सब्जी मंडियों में घूमते उस सांड से करना बेहतर होगा जो मस्ती से घूमता रहता है और जहाँ उसे मनपसंद टोकरी मिल जाती है वो अपना मुह गदा देता है कुंजड़ा उसके माथे पर डंडा बरसता रहता है लेकिन वो तभी हटता है जब काफी कुछ मुह में भर चुका होता है
अभी शायद सांड का पेट भरा नही या कहे की तीन बार सर पर पड़ी लाठियों से बच जाने की वजह से कुत्ता ढीठ हो गया है इसीलिए उसे एक बार फिर लग गई है और वो मुह उठाये दुनिया की सबसे बड़ी मस्जिद (ईरान) की तरफ़ दौड़ने लगा है वैसे विधाता की डिक्शनरी में भी तीन ही बार माफ़ करने का विधान है सो अब देखने वाली बात होगी की इस मस्जिद के मुल्ला की लाठी में इतना दम है या नही की वो कुत्ते का राम-नाम-सत करवा सके